धान खरीद में देरी से किसानों को नुकसान, धान माफियाओं को मिल रहा फायदा

धान खरीद में देरी से किसानों को नुकसान, धान माफियाओं को मिल रहा फायदा
सीएम से की हस्तक्षेप की मांग, एमएसपी से कम दाम पर धान बिकने का दावा
पीलीभीत। सरकारी धान खरीद शुरू होने में देरी को लेकर भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने नाराजगी जताई है। संगठन के जिलाध्यक्ष मंजीत सिंह ने आरोप लगाया कि धान खरीद की तारीख 1 अक्टूबर से बढ़ाकर 15 अक्टूबर किए जाने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने इस देरी के पीछे धान माफियाओं की लॉबी का हाथ होने की आशंका जताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है।मंजीत सिंह ने कहा कि पिछले वर्षों में सरकारी धान क्रय केंद्रों पर एक अक्टूबर से खरीद शुरू होती रही है। इस बार 15 अक्टूबर से खरीद की तारीख घोषित किए जाने से किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी हो रही है। उनका आरोप है कि किसानों की राय जाने बिना खरीद की तारीख आगे बढ़ाई गई। उन्होंने आशंका जताई कि इससे बिचौलियों और धान कारोबारियों को फायदा मिल सकता है। हालांकि, इस संबंध में उन्होंने किसी ठोस साक्ष्य का उल्लेख नहीं किया।भाकियू जिलाध्यक्ष के मुताबिक, महंगाई के कारण किसान पहले ही आर्थिक दबाव में हैं। उन्होंने दावा किया कि जिले में करीब 40 प्रतिशत किसानों की धान की उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से काफी कम कीमत पर बिक चुकी है। उनके अनुसार, कई किसानों ने आढ़तों और राइस मिलों पर सीधे बिक्री के माध्यम से 1600 से 1700 रुपये प्रति क्विंटल तक के भाव पर धान बेचा है।उन्होंने कहा कि शेष किसानों को भी सरकारी खरीद शुरू होने में देरी का नुकसान उठाना पड़ सकता है। मंजीत सिंह का दावा है कि एमएसपी का वास्तविक लाभ बहुत कम किसानों तक पहुंच पाता है और बड़ी संख्या में किसान अपनी उपज कम कीमत पर बेचने को मजबूर होते हैं।जिलाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से मांग की कि धान खरीद व्यवस्था की स्वयं समीक्षा करें और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय पर सरकारी खरीद शुरू नहीं हुई और किसानों को राहत नहीं मिली तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।मंजीत सिंह ने कहा कि धान खरीद प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जानी चाहिए, ताकि वास्तविक किसानों को एमएसपी का लाभ मिल सके और उन्हें बिचौलियों के दबाव में कम कीमत पर धान बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।



